चतुर्थ अध्याय (विशीर्णप्रतिसंधान प्रकरण)

श्लोक-1. वर्तमानं निष्पीडितार्थमुत्सृजन्ती  पूर्वसंसृष्टेन सह सन्दध्यात्।।1।।

अर्थः वेश्या जितना अधिक धन प्राप्त कर चुकी हो, उसे छोड़ती हुई वह अपने पहले प्रेमी से झगड़ा समाप्त कर सुलह कर ले।

श्लोक-2. स चेदवसितार्थो वित्तवान्सानुरागश्च ततः सन्धेयः।।2।।
अर्थः यदि प्रेमी धनवान हो तो उससे वेश्या को धन की प्राप्ति होगी। इसके साथ ही वेश्या से प्रेम करता हो तो वेश्या को शीघ्र ही उसके पास जाना चाहिए।

श्लोक-3. अन्यत्र गतस्तर्कयितव्यः। स कार्ययुक्तया षड्विधः।।3।।
अर्थः अपने पास से गया हुआ प्रेमी दूसरी स्त्री के पास गया होगा। इसकी जानकारी प्राप्त करने के 6 उपाय हैं।

श्लोक-4. इतः स्वयमपसृतस्ततोऽपि स्वयमेवापसृतः।।4।।
अर्थः पहली स्त्री के पास से स्वयं हटा तथा दूसरी स्त्री के पास जाने के बाद स्वयं हटा।

श्लोक-5. इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः।।5।।
अर्थः पहली और दूसरी दोनों स्त्रियों से पास से धक्का खाकर ही हटा है।

श्लोक-6. इतः स्वयमपसृतस्ततो निष्कासितापसृतः।।6।
अर्थः पहली स्त्री के पास से स्वयं हटा और दूसरी स्त्री के पास से निकाला गया।

श्लोक-7. इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृतः।।7।।
अर्थः पहली स्त्री के पास से स्वयं हटकर दूसरी स्त्री के पास स्थित हो गया।

श्लोक-8. इतो स्वयमपसृतस्तत्र स्थितः।।8।।
अर्थः पहली स्त्री के पास से धक्के खाकर हटा, और दूसरी स्त्री के पास से स्वयं हटा।

श्लोक-9. इतो निष्कासितापसृतस्तत्र स्थितः।।9।।
अर्थः पहली स्त्री के पास से निकाले जाने के बाद दूसरी स्त्री के पास चला गया।

श्लोक-10. इतस्ततश्च स्वयमेवापसृत्योपजपति चेदुभयोर्गुणानपेक्षी चलवुद्धिरसंधेयः।।10।।
अर्थः यदि प्रेमी यहां तथा वहां दोनों स्थानों से स्वयं हटकर फिर आने की कहे तो वह दोनों नायिकाओं के गुणों की परवाह न करने वाला चंचल बुद्धि का होता है। उससे फिर से सेक्स न किया जाए।

श्लोक-11. इतस्ततश्च निष्कासितापसृतः स्थिरबुद्धिः। स चेदन्यतो बहु लभमानया निष्कासितः स्यात्ससारोऽपि तया रोषितो ममामर्षाब्दहु दास्यतीति संधेयः।।11।।
अर्थः जो व्यक्ति यहां तथा वहां दोनों स्थानों से निकाले जाने पर बिल्कुल ही संबंध समाप्त कर लेता है तो वह स्थिर बुद्धि का आदमी होता है। यदि वेश्या ने दूसरे लोगों की अपेक्षा उस हटे हुए स्थिर बुद्धि के प्रेमी से अधिक लाभ प्राप्त किया हो, धनी हो, लेकिन नाराज कर दिया गया हो तथा वेश्या को इस बात पर यकीन हो कि दूसरी पर गुस्सा होने के कारण से मुझे अधिक धन देगा तो उससे अवश्य ही संधि कर लेनी चाहिए।

श्लोक-12. निःसारतया कदर्तया वा त्यक्तो न श्रेयान्।।12।।
अर्थः यदि प्रेमी गरीबी अथवा दुष्टता के कारण से हटाया गया हो तो उससे मिलना अच्छा नहीं होता है।

श्लोक-13. इतः स्वयमपसृतस्तो निष्कासितापसृतो यद्यतिरिक्तमादौ  दद्यात्ततः प्रतिग्राहाः।।13।।
अर्थः एक वेश्या के यहां से स्वयं अलग हुआ तथा किसी अन्य वेश्या के घर से निकाला गया प्रेमी पेशगी धन दे तो वेश्या उसके साथ सेक्स संबंध बना सकती है।

श्लोक-14. इतः स्वयपसृत्य तत्र स्थित उपजपंस्तर्कयितव्यः।।14।।
अर्थः एक स्थान से हटा हुआ तथा दूसरी जगह जाकर जम गया फिर कुछ कहलाता है तो उसके कहने पर भली प्रकार कर लेना चाहिए।

श्लोक-15. विशेषार्थी चागतस्ततो विशेषमपश्यन्नगन्तुकामो मयि मां जिज्ञासितुकामः स आगत्य सानुरागात्वाद्दास्यति।। तस्यां वा दोषानद्दष्ट्वा मयि भूयिष्ठान्गुणानधुना पश्यति स गुणदर्शी भूयष्ठं दास्यति।।15।।
अर्थः यह प्रेमी विशेषता को पसंद करता है इसीलिए मुझे छोड़कर चला गया था, लेकिन मुझसे ज्यादा विशेषता उसमें न पाकर फिर वापस आना चाहता है तथा मेरे पास रहकर मेरी विशेषताओं को जानना चाहता है। मुझ पर आकर्षित है इस कारण से यहां आकर जरूर धन देगा। या दूसरों की अपेक्षा मुझमें खास गुणों को देखकर यह गुणग्राही प्रेमी विपुल धन देगा।

श्लोक-16. बालो वा नैकत्रद्दष्टिरतिसंधानप्रधानो वा हरिद्रारागो वा यत्किंचनकारी वेत्यवेत्य संदध्यात्र वा।।16।।
अर्थः यह तो बुद्धि का प्रेमी है, स्थिरचित्त एवं विचारशील नहीं है। हल्दी के समान ही इसका अस्थायी रंग है, जो दिल में आता है कर बैठता है- इन सभी बातों पर विचार करके प्रेमिका उसे देखे। यदि फिर सेक्स करने लायक हो तो सेक्स करे नहीं तो नहीं।

श्लोक-17. इतो निष्कासितापसृतस्ततः स्वयमपसृत उपजपंस्तर्कयितवस्यः।।17।।
अर्थः एक वेश्या के द्वारा निकाला गया प्रेमी दूसरी वेश्या के पास जाकर वहां से स्वयं चला जाए तथा यदि फिर से मिलने के लिए संदेश भेजे तो उस पर विचार करना चाहिए।

श्लोक-18. अनुरागादागन्तुकामः स बहुदास्यति। मम गुणैर्भावितो योऽन्यस्यां न रमते।
अर्थः वेश्या सोचती है कि उसका प्रेमी उसके प्रति आकर्षित होने के कारण आने की इच्छा कर रहा है। इसलिए उससे अधिक धन प्राप्त होगा। वह मेरे गुणों से वह प्रभावित है, इसलिए दूसरी वेश्या में उसका मन नहीं लग रहा है।

श्लोक-19. पूर्वमयोगेन वा मया निष्कासितः स मां शीलयित्वा वैरं निर्यातयितुकामो धनमभियोगाद्वा मयास्यापहृतं तद्विश्चास्य प्रतीपमादातुकामो निर्वेष्टुकामो वा मां वर्तमानाद्भदयित्वा त्युक्तुकाम इत्यकल्याणबुद्धिररसंधेयः।।19।।
अर्थः सबसे पहले इसको मैने अन्यायपूर्वक निकाला था इस कारण से अब यह मुझसे मिलकर अपनी दुश्मनी निकालना चाहता है। मैने इधर-उधर करके इसका सारा धन प्राप्त कर लिया है। इस कारण से अब यह मुझे यकीन दिलाकर उस धन को हड़पना चाहता है। या फिर मेरे वर्तमान प्रेमी को मुझसे तोड़कर अलग करना चाहता है। इस प्रकार से यह अशुभ संकेत हुआ। इसलिए ऐसे प्रेमी से बिल्कुल भी संधि न करें।

श्लोक-20. अन्यथाबुद्धिः कालेन लम्भयितव्यः।।20।।
अर्थः यदि वह केवल उसके वशीभूत होकर आना चाहता हो तो उसे कुछ समय बाद मिलना चाहिए। उससे मिलने में किसी भी प्रकार की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।

श्लोक-21. इतो निष्कासितस्तत्र स्थिर उपजपत्रेतेन व्याख्यातः।।21।।
अर्थः जो प्रेमी अपने यहां से निकाल दिये जाने पर दूसरी वेश्या के पास चला गया हो तथा दुबारा मिलने के लिए किसी से कहलवा रहा हो तो, वह यदि मिलने लायक हो तो मिले नहीं तो न मिलें।

श्लोक-22. तेषूपजपत्स्वन्यत्र स्थितः स्वयमुपजपेत्।।22।।
अर्थः जो प्रेमी अपने यहां से जा करके दूसरी स्त्री के पास रहने लगे और संदेश भेजने पर वापस न आये तो उससे स्वयं बातें करनी चाहिए।

श्लोक-23. व्यलाकार्थं निष्कासितो मयासावन्यत्र गतो यत्नादानेतव्य।।23।।
अर्थः मैने तो अपने इसी प्रेमी को उसकी गलती के कारण निकाला था। मेरे यहां से जाने के बाद वह दूसरी स्त्री के पास जाकर रहने लगा। इसलिए यदि वह दुबारा आने की कोशिश कर रहा है तो उसे बुला लेना चाहिए।

श्लोक-24. इतः प्रवृत्तसंभाषो वा ततो भेदमवाप्स्यति।।24।।
अर्थः यदि वेश्या बात करने की पहल करती है तो वह वहां से अलग होकर भी आ सकता है।

श्लोक-25. तदर्थाभिघातं करिष्यति।।25।।
अर्थः मेरे यहां से आ जाने के बाद वह उसको आर्थिक रूप से हानि भी पहुंचा सकता है।  

श्लोक-26. अर्थागमकालो वास्य। स्थानवृद्धिरस्य जाता। लब्धमनेनाधिकरणम्। दारैर्वियुक्तः। पारतंत्र्याह्यावृत्तः। पित्रा भ्रात्रा वा विभक्तः।।26।।
अर्थः उसको बिजनेस अथवा नौकरी से अधिक आमदनी हुई है। जर जमीन आदि से भी विकास हुआ। अदालत आदि से भी रुपया मिल गया। अपनी पत्नी से पिता तथा भाइयों से अलग हो जाने से वह पूर्णता स्वतंत्र हो गया। ऐसे समय में ही वह अधिक से अधिक धन प्राप्त कर सकता है।

श्लोक-27. अनेन वा प्रतिबद्धमनेन संधिं कृत्वा नायकं धनिनमवाप्स्यामि।।27।।
अर्थः मेरा प्रेमी उससे मिला हुआ है और मैं उससे मिलकर उस धनवान को हासिल कर लूंगी।

श्लोक-28. विमानिता वा भार्यता तमेव तस्यां विक्रयमयिष्यामि।।28।।
अर्थः उसने मेरी बेइज्जती की है या फिर अपनी पत्नी से जाकर मिल गया है, अब मैं उसे उसकी पत्नी से अलग करके दोनों को आपस में लड़वा दें।

श्लोक-29. अस्य वा मित्रं मदद्वेषिणीं सपत्ती कामयते तदमुना भेदयिष्यामि।।29।।
अर्थः इसका दोस्त मुझसे दुश्मनी रखने वाली मेरी सौतन को चाहता है तो इसके दोस्त को इससे लड़ा दूंगी।
  
श्लोक-30. चलचित्ततया वा लाघवमेनमापादयिष्यामीति।।30।।
अर्थः इसको चंचलचित्त सिद्ध करके दूसरी वेश्याओं की नजर से एकदम गिरा दूंगी।

श्लोक-31. तस्य पीठमर्दादयो मातुर्दौःशील्येन नायिकायाः सत्यप्यनुरागे विवशायाः पूर्वः निष्कासनं वर्णयेयुः।।13।।
अर्थः आदि विश्वस्त नौकर जाकर प्रेमी से कहें कि वह तुम पर आकर्षित है लेकिन मां की कुटिलता के कारण विवश होकर उसने अपने आपको निकाल दिया है।

श्लोक-32. वर्तमानेन चाकामायाः संसर्गं विद्षं च।।32।।
अर्थः जो इस वक्त इसका प्रेमी है उसके साथ लगाव से सेक्स नहीं करती है, बल्कि उसके मन में नफरत बनी रहती है।

श्लोक-33. तस्याश्च साभिज्ञानैः पूर्वानुरागैरनं प्रत्यापयेयुः।।33।।
अर्थः वे पीठमर्द (वेश्या के सहायक) आदि सेवक निकाले गये प्रेमी से निकलने से पहले का प्रेमिका का अनुराग बताकर उसे यकीन दिलाने की कोशिश करें।

श्लोक-34. अभिज्ञानं च तत्कृतोपकारसंबंद्धं स्यादिति विशीर्णप्रति सधानम्।।34।।
अर्थः उसके प्यार की पहचान उसके द्वारा किये गये उपकारों से संबंध कराना चाहिए। यह वियुक्त नायक का प्रेम होता है।

श्लोक-35. अपूर्वपूर्वसंसृष्टयोः पूर्वसंसृष्टः श्रेयान्। स हि विदितशीलो दृष्टरागश्च सूपचारो भवतीत्याचार्याः।।35।।
अर्थः वेश्या से पहले मिले हुए अथवा कभी न मिले हुए लोगों में से पहले मिला हुआ व्यक्ति श्रेष्ठ होता है क्योंकि उसके शील स्वभाव से परिचय बना रहता है। उसका प्रेम जाना-पहचाना हुआ है। आचार्यों का मानना है कि उससे सरलता से अपनी प्रसंसा करायी जा सकती है।

श्लोक-36. पूर्वसंसृष्टः सर्वतो निष्पीडितार्थत्वात्रात्यर्थमर्थदो दुःखं च पुनर्विश्वासयितुम। अपूर्वस्तु सुखेनानुरज्यत इति वात्स्यायनः।।36।।
अर्थः आचार्य वात्स्यान का मानना है कि धन प्राप्त करने के लिए ही मिला जाता है। यदि पहला प्रेमी धनहीन हो गया हो तो उससे मिलना बेकार होता है। इसके अलावा उसे अपना विश्वास प्राप्त करना भी कठिन होता है तथा दूसरा नया प्रेमी तो सरलता से आकर्षित किया जा सकता है।

श्लोक-37. तथापि पुरुषप्रकतितो विशेषः।।37।।
अर्थः यद्यपि स्वभाव के आधार पर पुरुषों में भी विशेषताएं होती हैं। कोई नया आदमी ऐसा होता है जो आदत से कृपण होता है। कुछ भी नहीं देता है अथवा खुशामद करने पर भी अनुरक्त नहीं होता है। कुछ आदमी ऐसे होते हैं जो चूस लिए जाने पर भी, निकाल दिये जाने पर भी, प्रेमिका पर अपना विश्वास बनाये रखते हैं।

श्लोक-35. भवन्ति चात्र श्लोकः-
     अन्यां भेदयितुं गम्यादन्यतो गम्यमेव वा। स्थितस्य चोपघातार्थं पुनः संधानमिष्यते।।38।।
अर्थः इस विषय के श्लोक हैं- 19वें, 28वें तथा 25वें सूत्र में बताई गयी बातों को यहां बताया जा रहा है कि दूसरी प्रेमिका से बिछड़ा हुआ मिलने वाला प्रेमी अथवा दूसरी से अलग करने के लिए प्रेमी को मिलाया जा सकता है।

श्लोक-39. विभेत्यन्यस्य संयोगाद्यलीकानी च नेक्षते अतिसक्तः पुमान्यत्र भयाद्यहु ददाति च।।39।।
अर्थः अत्याधिक आसक्त प्रेमी जो दूसरे से सेक्स करने से डरता है और प्रेमिका के अपराधों को भी नहीं देखता है- ऐसा आदमी डर के कारण बहुत अधिक धन दे जाता है।

श्लोक-40. असक्तमभिन्नदेत सक्तं परिभवेत्तथा। अन्य दूतानुपाते च यः स्यादतिविशारदः।।40।।
अर्थः जो प्रेमी बहुत अधिक चालाक हो। उसे चाहिए कि किसी दूसरे का दूत आ जाने पर उसके सम्मुख असमर्थ की प्रशंसा करें और समर्थ की बुराई करें।

श्लोक-41. तत्रोपयायिनं पूर्वं नारी कालेन योजयेत् भवेच्चाच्छित्रसंधाना न च सक्तं परित्यजेत्।।4।।
अर्थः स्त्री को चाहिए कि कभी यदि नया धनवान प्रेमी तथा मिलने वाला बिछड़ा हुआ प्रेमी दोनों आ रहे हों तो जो अधिक धनी हो उसी से ही सेक्स करें क्योंकि बिछड़ा हुआ प्रेमी प्रतीक्षा भी कर सकता है। बिछड़े हुए से सेक्स करने में न तो हिचकिचाहट करें तथा न धनवान प्रेमी का त्याग करें।

श्लोक-42. सक्तं तु वशिनं नारी संभाप्याप्यन्यतो व्रजेत् ततश्चार्थमुपादाय सक्तमेवानुरञ्जयेत्।।42।।
अर्थः नारी (वेश्या) वशीभूत प्रेमी से बताकर दूसरे स्थान पर चली जाए और वहां से धन लाकर वशीभूत प्रेमी को प्रसन्न करे।

श्लोक-43. आयतिं प्रसमीक्ष्यादौ लाभं प्रीतिं च पुष्कलाम्। सौहृदं प्रतिसंदध्याद्विशीर्ण स्त्री विचक्षणा।।43।।
अर्थः चतुर तथा चालाक स्त्री को चाहिए कि सबसे पहले प्रभाव, लाभ, अधिक प्रेम तथा सौहार्द्र देख लें, तभी बिछड़े हुए को मिलाएं।

           अनेक उपायों से वेश्याएं अपने प्रेमी का धन ऐंठकर उसे बिल्कुल बर्बाद कर देती हैं। उसके बाद उसे अपने पास से निकाल देती हैं। इसके बारे में पिछले प्रकरण में भी बताया गया है। इस प्रकरण में उन प्रेमियों के मानसिक वृत्त का उल्लेख किया गया है। जो वेश्या के द्वारा निकाले जाने पर उस पर मोहित रहता है। इस प्रकार के विवेकशून्य प्रेमियों को वेश्या फिर से किस हालत में स्वीकार करे- इसके बारे में  विस्तार से वर्णन किया गया है।

           उन्होंने वेश्याओं तथा उनके प्रेमियों का मनोविश्लेषण करते हुए कहा है कि वियोग तथा मिलन की स्थिति में वेश्या को सबसे पहले पुरुष की अंतःप्रकृति का अध्ययन करके उसे मिलाएं अथवा हटाएं। कोई आदमी ऐसा होता है कि पुराने प्रेमी के हट जाने पर वह वेश्या का साथी उसके सदाचार तथा दीनता के सामने फेल हो जाया करता है। इसके अलावा कुछ लोग ऐसे स्वभाव के होते हैं जो वेश्या के द्वारा अपमानित होकर निकाले जाने तथा सारी संपत्ति और प्रतिष्ठा गंवा देने के बावजूद उसी के प्रति आकर्षित रहते हैं।

           इस प्रकरण के अंतर्गत वेश्याओं की चंचलता, अस्थिर बुद्धि तथा स्वार्थ के बारे में वर्णन किया गया है। वास्तव में देखा जाये तो यह पता चलता है कि वेश्याओं की मानसिकता समुद्र की लहरों की तरह चंचल होती है। शाम के समय से सुबह तक आकाश की क्षणिक लालिमा की तरह वेश्याओं के यहां उनके प्रेमियों की अवस्थिति क्षणभंगुर होती है। जिस प्रकार पैर में अलता लगाने के लिए मेंहदी की पत्तियों का रस निचोड़ करके उन्हें फेंक दिया जाता है, उसी प्रकार वेश्याएं भी अपने प्रेमी की धनशक्ति, पुरुषार्थ-शक्ति निचोड़कर उन्हें अलग फेंक देती हैं।

           इस सहजबोध को स्त्री अच्छी प्रकार से जानती है कि जीव तथा जड़ एक-दूसरे के बिना कोई भी परिणाम निकालने में सफल नहीं हो सकते हैं। इसलिए उसके प्रेम में शरीर और आत्मा दोनों का लगाव रहता है। लेकिन युवक जब उसे इस तरह का प्रेम करने दें। पुरुष की इसी गलती का अंजाम है कि अधिकतर दाम्पत्य जीवन, अधिकतर वेश्या भोग, जीवन, निराशा तथा अशांति के माहौल में तड़प रहे हैं।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे वैशिके षष्ठेऽधिकरणे विशीर्णप्रतिसंधानं चतुर्थोऽध्यायः।।

0 comments:

Post a Comment