पंचम अध्याय (लाभ-विशेष प्रकरण)

श्लोक-1. गम्यबाहुल्ये बहु प्रतिदिनं च लभमाना नैकं प्रतिगृह्वीयात्।।1।।

अर्थः वेश्या के पास सेक्स करने के लिए आने वालों की संख्या अधिक होने से उनमें परस्पर प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। इस कारण से वेश्या की आमदनी बढ़ जाती है। इसलिए वेश्या को किसी एक व्यक्ति विशेष से सेक्स न करके प्रतिदिन नये ग्राहकों से सेक्स करना चाहिए।

श्लोक-2. देशकालं स्थितिमात्मनो गुणान्सौभाग्यं चान्याभ्यो न्यूनातिरिक्तं चावेक्ष्य रजन्यामर्थ स्थापयेत्।।2।।
अर्थः किसी भी वेश्या को एक रात की फीस का निर्धारण देश तथा समय, वर्तमान स्थिति, गुण, सौभाग्य तथा वेश्याओं से अपने रूप, रंग, गुण आदि की तुलना करने के बाद निर्धारण करना चाहिए।

श्लोक-3. गम्ये दूतांश्च प्रयोजयेत्। तत्प्रतिबद्धाश्च स्वयं प्रहिणुयात्।।3।।
अर्थः सेक्स करने लायक व्यक्ति का उद्देश्य जानने के लिए अपने दूतों को लगा दें तथा स्वयं को उसके संपर्क के लोगों के द्वारा अपने अभिप्राय भेजें।

श्लोक-4. द्विस्त्रिश्चरिति लाभातिशयग्रहार्थंमेकस्यापि गच्छेत्। परिग्रहं च चरेत्।।4।।
अर्थः उससे अधिक धन प्राप्त करने के लिए 3-4 दिनों तक लगातार एक नियत फीस पर ही सेक्स करायें। तथा उसकी सेवा उसकी पत्नी के समान बनकर स्वयं ही करना चाहिए।

श्लोक-5. गम्ययौगपद्ये तु लाभसाम्ये यद्द्रव्यार्थिनी स्यात्तद्दायिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्यः।।5।।
अर्थः आचार्यों के अनुसार यदि किसी वेश्या के पास एक साथ कई लोग सेक्स करने के लिए आ जाएं तथा सभी सेक्स करने के लिए एक समान ही फीस देने को तैयार हो तो ऐसी स्थिति में वेश्या को जिससे फीस ले लेगी तो दूसरा उससे ज्यादा देगा। 

श्लोक-6. अप्रत्यादेयत्वात्सर्वकार्याणां तन्मूलत्वाद्धिरण्यद इति वात्स्यायनः।।6।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन का मानना है कि अविश्वास की स्थिति में भी न लौटाया जाने वाला पैसा ही सभी कार्यों का मूल होता है अथवा आभूषण और गहने आदि वस्तुएं पैसों से ही खरीदी जा सकती हैं। इसलिए वेश्या को जहां तक हो सके अपने प्रेमी से पैसे ही प्राप्त करने चाहिए।

श्लोक-7. सुवर्णरजतताम्रकांस्यलोहभाण्डोपस्करास्तरणप्रावरण वासोविशेषगंधद्रव्यकटुकभाण्डघृतलैलधान्यपशुजातीनां पूर्वपूर्वतो विशेषः।।7।।
अर्थः सोना, चांदी, तांबा, लोहा, बर्तन, सामान, बिस्तर, लिहाफ, कम्बल, रेशमी, कपड़े, चंदन आदि गंध वाले पदार्थ, कालीमिर्च घड़े आदि, घी तेल अनाज, पशु इन वस्तुओं में अंत में पहले की तरह एक-एक चीजें उत्तम होती हैं। इसलिए वेश्या को ऐसी ही चीजें लानी चाहिए।

श्लोक-8. यत्तत्र साम्याद्वा द्रव्यसाम्ये मित्रवाक्यदतिपातित्वादायतितो गम्यगुणतः प्रीतितश्च।।
अर्थः यदि दो समान प्रेमी हो तो शुभचिन्तक लोग जिसे पसंद करें या जिसको अधिक गुणी, सुंदर तथा प्रभावशाली समझें, उसी की दी गयी चीजों को ग्रहण करें।

श्लोक-9. रागित्यागिनोस्त्यागिनी विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः।।9।।
अर्थः आचार्यों का कहना है कि अधिक अनुराग रखने वाले की अपेक्षा दानशील त्यागी से अधिक लाभ मिलना निश्चित होता है।

श्लोक-10. शक्यो हि रागिणी त्याग आधातुम्।।10।।
अर्थः न देने वाले व्यक्ति से भी उपायों द्वारा त्याग कराया जा सकता है।  

श्लोक-11. लुब्धोऽपि हि रक्तस्त्यजति न तु त्यागी निर्बन्धाद्रज्यत इति वात्स्यायनः।।।11।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि अनुरक्त लालची होते हुए भी धन दे सकता है लेकिन त्यागी को अनुरक्त बनना काफी कठिन होता है।

श्लोक-12. तत्रापि धनवदधनवतोर्धनवति विशेषः। त्यागिप्रयोजनकर्त्रोः प्रयोजनकर्तरि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः।।12।।
अर्थः आचार्यों का मानना है कि यहां पर भी अमीर तथा निर्धन लोगों में धनवान विशेष होता है तथा त्यागी और नायिका का स्वार्थ सिद्ध करने वाला प्रेमी विशेष होता है।

श्लोक-13. प्रयोजनकर्ता सकृत्कृत्वा कृतिनमात्मानं मन्यते त्यागी पुनरतीतं नापेक्षत इति वात्स्यायनः।।13।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि वेश्या का प्रयोजन सिद्ध करने वाला एक बार प्रयोजन सिद्ध करके यह सोचता है कि एक बार काम कर दिया है. अब क्यों करूं। क्योंकि दानशील त्यागी प्रेमी तो जो धन दे चुका होता है उसके बारे में सोचता तक भी नहीं है।

श्लोक-14. तत्राप्यात्ययिकतो विशेषः।।14।।
अर्थः आवश्यकता के अनुसार इन दोनों में भी विशेषताएं होती हैं।

श्लोक-15. कृतज्ञत्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः।।15।।
अर्थः पहले के आचार्यों का कहना है कि कृतज्ञ तथा त्यागी इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों में त्यागी व्यक्ति से अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

श्लोक-16. चिरमाराधितोऽपि त्यागी व्यलीकमेकमुपलभ्य प्रतिगणिकया वा मिथ्यादूषितः श्रममतीतं नापेक्षते।।16।।
अर्थः बहुत दिनों तक उपायों द्वारा साबित किया गया त्यागी वेश्या के एक अपराध को देखकर या दूसरी सामने की वेश्याओं से बहकाया जाकर वेश्या के किये गये परिश्रम के दुखों की परवाह नहीं करता है।  

श्लोक-17. प्रायेण हि तेजस्विन ऋजुवोऽनाद्दताश्च त्यागितो भवन्ति।।17।।
अर्थः और त्यागी प्रायः तेजस्वी व्यक्ति सरल स्वभाव के नहीं होते हैं। यदि कहीं पर उनका अनादर होता है तो वे उसे बर्दाश्त नहीं करते हैं।

श्लोक-18. कृतज्ञस्तु पूर्वश्रमापेक्षी न सहसा विरज्यते। परीक्षितशीलत्वाश्च न मिथ्या दूष्यत इति वात्स्यायनः।।18।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि कृतज्ञ व्यक्ति परिश्रम को समझता है। इसीलिए वह एकाएक विरक्त नहीं होता है, वह प्रेमिका के स्वभाव से परिचित रहता है इसलिए दूसरी वेश्याओं के बहकाने में नहीं आता है।

श्लोक-19. तत्राप्यापतितो विशेषः।।19।।
अर्थः अनुरक्त, त्यागी तथा कृतज्ञ इन तीनों में से वेश्या को जिससे सबसे अधिक धन प्राप्त उसी के साथ सेक्स करना चाहिए।

श्लोक-20. मित्रवचनार्थागमयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः।।20।।
अर्थः पहले आचार्यों के अनुसार दोस्तों के सुझाव तथा धन की प्राप्ति इन दोनों में से धन का लाभ प्रत्यक्ष विशेषता रखता है।

श्लोक-21. सोऽपि ह्यर्थागमो भवति। मित्रं तु सकृद्वाक्ये प्रतिहते कलुषितं स्यादिति वात्स्यायनः।।21।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन के अनुसार दोस्तों की बातें न मानने पर भी धन तो प्राप्त होगा ही लेकिन बात न मानी जाने पर दोस्त नाराज हो जाएं तो उनसे बनने वाले सभी कार्य बिगड़ जाते हैं।

श्लोक-22. तत्राप्यतिपाततो विशेषः।।22।।
अर्थः इस धन संचय में भी फिर न मिलने वाले को अवश्य वाले के जरूर प्राप्त कर लेना चाहिए।

श्लोक-23. तत्र कार्यसंदर्शनेन मित्रमनुनीय श्चोभूते वचनमस्त्विति ततोऽतिपातिनमर्थं प्रतिगृहणीयात्।।23।।
अर्थः काम के बहाने दोस्त से अनुनय विनय करके शीघ्र ही लाभ प्राप्त कर लें और उससे कहे कि मैं तुम्हारी बात अवश्य ही पूरी कर दूंगी।

श्लोक-24. अर्थागमानर्थप्रतीघातयोरर्थागमे विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः।।24।।
अर्थः अर्थलाभ तथा अनर्थ का निवारण- इन दोनों में धनागम विशेष माना जाता है- ऐसा पहले के आचार्यों का मानना है।

श्लोक-25. अर्थः परिमितावच्छेदः, अनर्थः पुनः सकृत्प्रसृतो न ज्ञायते क्कावतिष्ठत इति वात्स्यायनः।।25।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि धन हमेशा ही प्राप्त होता रहता है लेकिन यदि अनर्थ होना शुरू हो जाता है तो उसके अंत का कोई ठिकाना नहीं होता है।

श्लोक-26. तत्रापि गुरुलाघवकृतो विशेषः।।26।।
अर्थः इसके अंतर्गत भी न्यूनाधिक्य समझकर विशेष को ग्रहण कर लेना आवश्यक होता है।

श्लोक-27. एतेनार्थसंशायदनर्थप्रतीकारे विशेषो व्याख्यातः।।27।।
अर्थः इस बात से यह स्पष्ट होता है कि अर्थ के संशय में अनर्थ की रोकथाम करने में ही विशेष लाभ प्राप्त होता है।

श्लोक-28. देवकुलतडारामाणां करणम्, स्थलीनामग्निचैत्यानां निबंधन, गोसहस्त्राणां पात्रान्तरितं ब्राह्मणेभ्यो दानम्, देवतानां पूजोपहारप्रवर्तनम्, तद्ययसहिष्णोर्वा धनस्य परिग्रहणमित्युत्तगणिकानां लाभातिशयः।।28।।
अर्थः जो उत्तम वर्ग की नारी होती हैं उन्हें चाहिए कि वह अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए मंदिर बनवायें। तालाब का निर्माण बनायें। बाग-बगीचे लगवायें। नीची जगहों में लोगों को आने-जाने की सुविधा के पुल का निर्माण करायें। अपने निवास स्थान से बाहर मिट्टी का घर बनाकर उसमें अग्निहोत्र का सारा सामान रखकर रोजाना अग्निहोत्र करायें। किसी सुपात्र व्यक्ति को जरिया बनाकर उसके द्वारा ब्राह्मणों को हजार गायें दान में दें। देवताओं के भोग प्रसाद की व्यवस्था करें। इस प्रकार के ऐसे ही लोकोपकारी तथा धार्मिक कार्यों को अच्छी तरह करने का खर्च बर्दाश्त करें तो उनके अधिक लाभ का उपयोग भी हो जाएगा।

श्लोक-29. सार्वांगिकोऽलंकारयोगो गृहस्योदारस्य करणम्। महार्हैर्भाण्डैः परिचारकैश्च गृहपरिच्छदस्योज्जवलततेति रूपाजीवानां लाभातिशयः।।29।।
अर्थः मध्यम वर्ग वाली रेखाएं विशेष लाभ करने के लिए संपूर्ण शरीर पर गहने धारण करें, निवास स्थान को कलात्मक तरीके से सजाकर रखें तथा उसमें कीमती बर्तन रखें हो, नौकर-चाकर, कमरों की खिड़कियों, दरवाजों, पर्दों को साफ करने में लगे रहें। घर के सभी कपड़े, पर्दे अच्छी तरह से साफ रखने चाहिए।

श्लोक-30. नित्यं शुक्लामाच्छादनमपक्षुधमत्रपानं नित्यं सौगन्धिकेन ताम्बूलेन च योगः सहिरण्यभागलंकरणमिति कुम्भदासीनां लाभातिशयः।।30।।
अर्थः अधम वर्ग की कुम्भदासी वेश्याओं को अधिक लाभ प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन साफ कपड़े पहनने चाहिए। भरपेट भोजन करना चाहिए। परफ्यूम, तेल और पान का भी उपयोग करना चाहिए तथा चांदी के गहनों के साथ कुछ सोने के गहने भी पहनने चाहिए।

श्लोक-31. एतेन प्रदेशेन मध्यामाध्यमानामपि लाभातिशयान् सर्वासामेव योजयेदित्याचार्याः।।31।।
अर्थः पहले के आचार्यों का मानना है कि उत्तमा, मध्यमा, अधमा, गणिका के साथ ही अधिक लाभ को भी उत्तम, मध्यम तथा अधम ही समझना चाहिए।

श्लोक-32. देशकालविभवसामर्थ्यानुरागलोकप्रवृत्तिवशादनियतलाभादियमवृत्तिरिति वात्स्यायनः।।32।।
अर्थः आचार्य वात्स्यायन के अनुसार देश, समय, वैभव, सामर्थ्य, अनुराग तथा लोकव्यवहार के कारण से लाभ हमेशा नहीं होता रह सकता है। इसलिए धन-प्रधान वेश्याओं की जिस वृत्ति के बारे में बताया गया है वह कभी भी समान नहीं रह सकती है।

श्लोक-33. गम्यमन्यतो निवारयितुकामा सक्तमन्यस्यामपहर्तुकामा वा अन्यां वा लाभतो वियुयुक्षमाणागम्यंसंसर्गादात्मनः स्थानं वृद्धिमायतिमभिगम्यतां त मन्यमाना अनर्थ प्रतीकारे वा साहाय्यमेनं कारयितुकामा सक्तस्य वान्यम् व्यलीकार्थिनी पूर्वोपकारमकृतमिव पश्यंती केवलप्रीत्यर्थिनी वा कल्याणबुद्धेरल्पमपि लाभं प्रतिगृहणीयात्।।33।।
अर्थः मौके और आवश्यकता के अनुसार कभी थोड़ा फायदा भी ग्रहण कर लेना चाहिए। किस हालत तथा स्थान में वेश्या को थोड़ा लाभ ग्रहण करना चाहिए, कह रहे हैं-

           प्रेमी को किसी दूसरी गणिका के पास सेक्स के लिए जाने से रोकने में, या उसको फायदे से वंचित करने में, प्रेमी से संसर्ग से घर, मंदिर आदि कोई स्थान बनाने में, अपनी वृद्धि करने में, अपना प्रभाव स्थापित करने में, दूसरे प्रेमियों को आकर्षित करने के लिए, अपनी पसंद की कोई वस्तु बनवाने में, या पहले किये गये उपकारी को भूलकर गरीब प्रेमी को अपराधी ठहराकर उसे छोड़ने में तथा किसी शुभचिंतक आदमी को अपना प्रेमी बनाने में गणिका थोड़ा-बहुत लाभ भी प्राप्त कर सकती है।

श्लोक-34. आयत्यर्थिनी तु तमाश्रित्य चानर्थ प्रतिचिकीर्षन्ती नैव प्रतिगृहणीयात्।।34।।
अर्थः यदि भविष्य में वेश्या बड़ा फायदा देखती है और ऐसा करने में कोई विशेष परेशानी हो तो प्रेमी से तुरंत ही कुछ नहीं लेना चाहिए।

श्लोक-35. त्यक्षाम्येनमन्यतः प्रतिसंधास्यामि, गमिष्यति दारैर्योक्ष्यते नाशयिष्यत्यनर्थान्, अंकुशभूत उत्तराध्यक्षोऽस्यागमिष्यति स्वामी पिता वा, स्थानभ्रंशो वास्य भविष्यति चलचित्तश्चेति मन्यमाना तदात्वेतस्यमाल्लाभमित्छेत्।।35।।
अर्थः इस प्रेमी को छोड़कर दूसरे से संबंध जोडूंगी, यह स्वयं ही चला जाएगा, अपनी पत्नी से फिर मिल जाएगा। या, यह अड़चनों, रुकावटों को दूर कर देगा, इसके ऊपर पिता आदि का नियंत्रण है, या यह अपने पद अथवा अधिकार से भ्रष्ट हो जाएगा अथवा चंचल मन का है। यदि वेश्या ऐसा समझती है तो ऐसे नायक से शीघ्र मिले, उसी समय ले ले।

श्लोक-36. प्रतिज्ञातमीश्चरेण प्रतिग्रहं लप्स्यते अधिकरणं स्थानं वा प्राप्यसि वृत्तिकालोऽस्य वा आसन्नः वाहनमस्यागमिष्यति स्थलपत्रं वा सस्यमस्य पक्ष्यते कृतमस्मित्र नश्यति नित्यमविसंवादको वेत्यायत्यामिच्छेत्। परिग्रहकल्पं वाचरेत्।।36।।
अर्थः राजा अथवा शासन से इसे धन की प्राप्ति निश्चित होगी, या यह न्यायालय अथवा अक्षपटल में कोई ऊंचे पद को प्राप्त करेगा। इसे जीविका समीप भविष्य में मिलेगी, व्यापारिक चीजें बेचकर इसके जहाज अथवा दूसरे व्यापारिक वाहन शीघ्र ही वापस आने वाले हैं, उनकी जमींदारी या जागीर की जमीन उपजाऊ हैं। इसकी खेती पककर तैयार होने वाली है। यह कृतज्ञ है, इससे संसर्ग करना हानिकारक होगा, यह गप्पी या धूर्त नहीं है, यह जो भी कहेगा, उसको पूरा भी करेगा, इसी तरह अन्य प्रेमियों में से किसी एक से भविष्य में पूरा फायदा उठाने की इच्छा तथा आशा रखकर गणिका उसकी सेवा उसकी पत्नी के समान करें।

श्लोक-37. भवन्ति चात्र श्लोकाः-
     कृच्छाधिगतवित्तांश्च राजवल्लभनिष्ठुरान्। आयत्यां च तदात्वे च दूरादेव विवर्जयेत्।।37।।
अर्थः इस विषय में प्राचीन श्लोक हैं- जिसको बड़ी कठिनाई से धन प्राप्त हो, जो राजा को खुश रखने के लिए क्रूर करते हों, उनसे वर्तमान में अथवा भविष्य में कितना भी धन प्राप्त होने की होने की आशा हो। तब भी वेश्या को ऐसे लोगों से दूर रखना चाहिए।

श्लोक-38. अनर्थों वर्जने येषां गमनेऽभ्युदयस्तथा। प्रयत्नोनापि तान् गृह्व सापदेशमुपक्रमेत्।।38।।
अर्थः जिनको त्याग देने से दूसरे अनर्थ की संभावना होते हुए भी अपने अभ्युदय का उम्मीद हो तो ऐसे प्रेमियों से प्रयत्नपूर्वक सेक्स करना चाहिए।

श्लोक-39. प्रसन्ना ये प्रयच्छन्ति स्वल्पेऽपगणितं वसु। स्थूललक्षान्महोत्साहांस्तान्गच्छेत्स्वैरपि व्ययैः।।39।।
अर्थः जो थोड़ी सी खुशी प्राप्त हो जाने पर अपना पूरा धन देने को तैयार रहते हैं। वेश्या को इस प्रकार के पुरुषों को अपना धन खर्च करके मिलाना चाहिए।

           इस प्रकरण के अंतर्गत वेश्याओं के उस विशेष धनलाभ की चर्चा की गई है जिसे वे अनेक उपायों से प्रेमियों को फंसाकर प्राप्त करती हैं। शुरू में तीन प्रकार की वेश्याओं का उल्लेख किया गया है- 1. एकपरिग्रह 2. अनेकपरिग्रह 3. अपरिग्रह। जो स्त्री एकचारिणी बनकर एक ही प्रेमी के पास रहने लगती है। वह एक परिग्रह, जो अनेक प्रेमियों से सेक्स करके धन की प्राप्ति करती है। वह अनेकपरिग्रह, और जो किसी से सम्बद्ध न होकर जो भी आता है, उसी से सेक्स करके धन प्राप्त करती है वह अपरिग्रह वेश्या कहलाती है।

           कामशास्त्र के अंतर्गत वेश्याओं का शासन पर कोई भी नियंत्रण प्रतीत नहीं होता। वैशिक अधिकरण में प्रेमियों, वेश्यागामियों को हर प्रकार से ठगने उन्हें मुड़ने की तथा निःसत्व हो जाने पर धक्का देकर निकाल देने की, अपराध लांछन लगाकर उनकी सामाजिक बदनामी फैलाने की पूरी छूट थी। राजा तथा अन्य राजपुरुष भी कुछ विशेष वेश्याओं की हिमायत किया करते थे। किसी व्यक्ति से उचित धन प्राप्त न होने पर अदालत में दावा करके प्राप्त कर लेती थी। कौटिल्य अर्थशास्त्र के गणिकाध्यक्ष प्रकरण तथा कामसूत्र के वैशिक अधिकरण का तुलनात्मक अध्ययन करने पर कुछ विद्वानों की यह मान्यता खत्म हो जाती है कि कौटिल्य तथा वात्स्यायन एक ही थे। यह बात सही है कि दोनों शास्त्रों की रचना पद्धति में साम्य है, लेकिन एक ही समय में एक ही आचार्य द्वारा लिखे गये ग्रंथों में नियम तथा विधान तथा सामाजिक तथा राजनीतिक परंपराओं में इतना वैषम्य कथापि नहीं हो सकता है।

           आचार्य कौटिल्य के समान ही कामसूत्रकारों ने भी उत्तम, मध्यम तथा अधर्म तीन प्रकार की वेश्याओं मानी है। लेकिन सिद्धांत तथा उद्देश्य अलग हैं। कौटिल्य के भेद राजाओं की परिचर्या के लिए हैं। उनकी योग्यता के अनुसार उन्हें अधिक और कम वेतन दिये जाने के हैं। लेकिन कामसूत्र के भेद अर्थोपार्जन तथा प्रेमियों के साथ व्यवहार पर आधारित है।

           आचार्य वात्स्यायन ने अनेक तरह की वेश्याओं का समुच्चय कर गणिका, रूपाजीवा तथा कुम्भदासी- ये तीन प्रकार की वेश्याएं निर्धारित की हैं। उन्होंने गणिका को उत्तमा, रूपाजीवा को मध्यमा तथा कुंभदासी को अधमा माना है।

     कामसूत्रकार ने यहां पर "समानप्रसवा जाति" सिद्धांत को स्वीकार कर वेश्या को स्त्री जाति के अंतर्गत मानकर अपनी सदाशयता का परिचय दिया है। वेश्या नारी का एक विकृत रूप है या नारी वर्ग का  विकृत रूप वेश्या वर्ग है।

           ऐसा कहा जाता है कि जिस प्रकार मनुष्य से उच्च देवता व मनुष्य से निम्न यक्ष, गंधर्व योनियां होती हैं, उसी तरह मानवी स्त्री से उच्च अप्सरा भी स्त्री हो सकती है, लेकिन गणिका वेश्या को स्त्री योनि (जाति) से अलग एक योनि मान लेना तर्क, बुद्धि तथा मानव विज्ञान के खिलाफ है। ऐसा महसूस होता है कि जिस प्रकार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन चार मुख्य वर्णों के अंतर्गत अनेक वर्ण माने जाने लगे हैं। उसी प्रकार नारी जाति के अंतर्गत वेश्याओं को भी जन्मना जाति स्वीकार किया गया है। लेकिन इसे सैधांतिक न मानकर व्यवहारिक माना जाता है।

इति श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे वैशिके षष्ठेऽधिकरणे लाभविशेषः पश्चमोऽध्यायः।।

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