द्वितीय अध्याय (सपत्नी पुजेष्ठा वृत्तम् प्रकरण)
श्लोक-1. जाडय्दौः शील्यदौर्भाग्येभ्यः प्रजानुत्पत्तेराभीक्ष्ण्येन दारिकोत्पत्तेर्नायकचापलाद्वा सपत्न्यधिवेदनम्।।1।।
अर्थ- बेवकूफी, चरित्रहीनता, दुर्भाग्य तथा निःसंतान होने
या बार-बार लड़कियों के पैदा होने से या पति की चंचल प्रवृत्ति के होने के
कारण से एक पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह किया जाता है।
श्लोक-2. दादित एवं भक्तिशीलवैदग्धयख्यापनेन परिजिहीर्षेत्। प्रजानुत्पत्तौ च स्वयमेव सापत्नके चोदयेत।।2।।
अर्थ-
इस प्रकार नारी के लिए यह उचित है कि वह पहले से ही अपनी भक्ति, सच्चे
चरित्र तथा चतुरता से पति को दूसरी शादी करने का मौका न दे। कभी उससे कोई
संतान उत्पन्न न हो तब वह स्वयं अपने पति को दूसरा विवाह करने के लिए
प्रेरित करे।
श्लोक-3. अधिविद्यमाना च यावच्छक्तियोगादात्मनोऽधिकत्वेन स्थितिं कारयेत्।।3।।
अर्थ-
नई दुल्हन शीघ्र ही ससुराल में अधिक से अधिक अधिकार प्राप्त करना चाहती
है। इससे उसकी घर की अन्य स्त्रियों से लड़ाई होने लगती है और दोनों में
सौतिया जलन उत्पन्न होता है।
श्लोक-4.
आगतां चैनां भगिनीवदीक्षेत। नायकविदितं च प्रादोषिकं विधिमतीव यत्नादस्याः
कारयेत्। सौभाग्यजं वैकृतमुत्सेकं वास्या नाद्रियेत।।4।।
अर्थ- इस
प्रकार के सौतिया जलन को दूर करने के लिए आचार्य़ वात्स्यायन कहते हैं कि-
पहली विवाहिता पत्नी को चाहिए कि वह दूसरी पत्नी को अपनी सौतन न मानकर छोटी
बहन के समान माने। रात में उसे सेक्स करने
योग्य श्रंगार करे। इससे दोनों में परस्पर प्रेम भी बढे़गा। यदि कभी नई
बहू कोई कड़वी बात भी कह दे तो बड़ी बहू उसकी बातों को गंभीरता से न ले,
बल्कि उसे प्यार से समझाएं।
श्लोक-5.
भर्तरि प्रमाद्यन्तीमुपेक्षेत। यत्र मन्येतार्थिमयं स्वयमपि प्रतिपत्स्यत
इति तत्रैनामादरत इति तत्रैनामादरत एवानुशिष्यात्।।5।।
अर्थ- यदि
नई बहू पति के प्रति किसी भी प्रकार की असावधानी करे तो बड़ी बहू उसकी
उपेक्षा कर दे और जब कभी भी उसका मन प्रसन्न हो तो भविष्य में ऐसा न करने
की सलाह दें।
श्लोक-6. नायकसंश्रवे च रहसि विशेषानधिकान् दर्शयेत्।।6।।
अर्थ- बड़ी
बहू को नई बहू को किसी एकांत स्थान में ले जा करके काम कला (सेक्स ज्ञान)
के बारे में जानकारी देनी चाहिए, जिस स्थान से उसका पति भी सुन सके।
श्लोक-7. तदपत्येष्वविशेषः। परिजनवर्गेऽधिकानुकम्पा। मित्रवर्गे प्रीतिः।।7।।
अर्थ-
बड़ी बहू नई बहू के बच्चों से अधिक प्यार करे, उसके नौकरों पर अधिक से
अधिक अनुग्रह रखें, उसकी सहेलियों से प्रेम व्यवहार रखें। उसके भाई-भतीजों
से स्नेह रखें। अपने भाई-भतीजों की अपेक्षा उसके भाई-भतीजों का अधिक सम्मान
करें।
श्लोक-8. बह्वीभिस्त्वधिविन्ना अव्यवहितया संसृज्येत।।8।।
अर्थ- यदि कई सौते हों तो जो ज्येष्ठ हो उसे अपनी से छोटी सौत से अधिक प्रेम करना चाहिए।
श्लोक-9. यां तु नायकोऽधिकां चिकीर्षेतां भूतपूर्वसुभगया प्रोत्साह्य कलहयेत।।9।।
अर्थ- कई पत्नियों में से जिस किसी एक को पति अधिक प्यार करता हो उसके साथ दूसरी पत्नी का झगड़ा करा देना चाहिए।
श्लोक-10. ततश्चानुकम्पेत।।10।।
अर्थ- और फिर कलह बढ़ाने के लिए उसे आश्वासन दें।
श्लोक-11. ताभिरेकत्वेनाधिकां चिकीर्षितां स्वयमविवदमाना दुर्जनीकुर्यात्।।11।।
अर्थ-
पति यदि किसी औरत को अधिक महत्व देता है तथा ज्येष्ठ पद देना चाहता है तो
ज्येष्ठ पत्नी को चाहिए कि वह स्वयं न लड़कर दूसरी सौतों को उससे भिड़ाकर
उसे निकृष्ट (बिल्कुल बेकार) सिद्ध कर दे।
श्लोक-12. नायकेन तु कलहितामेनां पक्षपातावलम्बनोपबृंहितामाश्वसयेत्।।12।।
अर्थ- पति के साथ जिसका बिगाड़ हो जाए उसका कलह और बढ़ा दिये जाए। इसके बाद फिर सुलह करायी जाए।
श्लोक-13. कलहं च वर्धयेत्।।13।।
अर्थ- वह जेठी नारी को अपनी सौतों में लड़ाई को बढ़ाती रहे।
श्लोक-14. मन्दं वा कलहमुपलब्ध स्वमयेव संधुक्षयेत्।।14।।
अर्थ- जब लड़ाई शांत होने लगे तो फिर लड़ाई को बढ़ा दें।
श्लोक-15. यदि नायकोऽस्यामद्यापि सानुनय इति मन्येत तदा स्वयमेव संध्यौ प्रयतेतेति ज्येष्ठावृत्तम्।।15।।
अर्थ-
इतने पर भी वह समझ जाए कि नायक उस पर प्रेम करता है। तब वह जेठी सौत स्वयं
सुलह कराने की कोशिश करें। ज्येष्ठ सपत्नी (सौत) का बर्ताव समाप्त हुआ।
श्लोक-16. कनिष्ठा तु मातृवत्सपत्नीं पशयेत्।।16।।
अर्थ- इसके अंतर्गत छोटी सौत के बर्ताव के बारे में बताया जा रहा है-
छोटी बहू को अपने से बड़ी बहुओं को माता के समान मानना चाहिए।
श्लोक-17. ज्ञातिदायमपितस्या अविदितं नोपयुञ्जीत।।17।।
अर्थ- अपने माता-पिता तथा भाई-बंधुओं द्वारा दी गयी वस्तुओं को भी बड़ी बहू की आज्ञा के बिना उपयोग में न लाएं।
श्लोक-18. आत्मवृत्तान्तांस्तदधिष्ठितान् कुर्यात्।।18।।
अर्थ- अपने सभी कार्य-व्यवहार घर की बड़ी बहू के अधीन कर दें।
श्लोक-19. अनुज्ञाता पतिमधिशयीत।।19।।
अर्थ- बड़ी बहू की अनुमति लेकर पति के पास जाए।
श्लोक-20. न वा तस्या वचनमन्यस्याः कथयेत्।।20।।
अर्थ- उसकी बातों को और किसी से न कहे।
श्लोक-21.तदपत्यानि स्वेभ्योऽधिकानि पश्येत्।।21।।
अर्थ- अपने बच्चों से अधिक छोटी बहू के बच्चों को प्यार करें।
श्लोक-22. रहसि पतिमधिमुपचरेत्।।22।।
अर्थ- किन्तु एकांत में पति की सेवा उससे भी अधिक करें।
श्लोक-23. आत्मनश्च सपत्नीविकारजं दुःखं नाचक्षीत्।।23।।
अर्थ- सौत से जो दुःख होता हो, वह पति से नहीं कहना चाहिए।
श्लोक-24. पत्युश्च सविशेषकं गूढ़ मानं लिप्सेत्।।24।।
अर्थ- दूसरी सौतनों के न रहने पर पति से अधिक सम्मान तथा प्रेम प्राप्त करने की चेष्टा करें।
श्लोक-25. अनेन खलु पथ्यदानेन जीवामीति ब्रूयात्।।25।।
अर्थ- अपने पति से कहें कि आपका सम्मान ही मेरा जीवन है।
श्लोक-26. तत्तु श्लाघया रागेण वा बहिर्नाचक्षीत्।।26।।
अर्थ- लेकिन पति से प्राप्त सम्मान के गर्व से लड़ाई हो जाने पर कभी भी प्रकट न करें।
श्लोक-27. भिन्नरहस्या हि भर्तुरवज्ञां लभते।।27।।
अर्थ- पति का राज (गुप्त बातें) प्रकट कर देने वाली औरतें पति के द्वारा अपमानित होती हैं।
श्लोक-28. ज्येष्ठाभयाच्च निगूढसंमानर्थिनी स्यादिति गोनर्दीयः।।28।।
अर्थ- बड़ी सौतन के डर से अकेले में ही पति के सम्मान का आनंद लेना चाहिए। यह गोनर्दीय आचार्य का कहना है।
श्लोक-29. दुर्भगामनपत्यां च ज्येष्ठामनुकम्पेत नायकेन चानुकम्पयेत्।।29।।
अर्थ- अभागिन, संतानरहित (जिसके कोई संतान न हो) जैठी सौत पर दया करें तथा पति को भी उस पर दया रखने को प्रेरित करें।
श्लोक-30. प्रसह्य त्वेमेकाचारिणीवृत्तमनुतिष्ठेदिति कनिष्ठावृत्तम्।।30।।
अर्थ-
यह जो बड़ी तथा छोटी सौतन का व्यवहार बताया गया है। इसी के अनुसार इनके
बाद बीच की छोटी-बड़ी सौतने हों तो उनका भी ऐसा ही बर्ताव होना चाहिए। छोटी
बहू का बर्ताव समाप्त हुआ।
श्लोक-31. वृत्तमाह-
विधवा त्तिवन्द्रियदौर्बल्यतादातुरा भोगिनं गुणसंपन्नं च या पुनर्विन्देत्सा पुनर्भूः।।31।।
अर्थ- जो विधवा कामवासना के वशीभूत होकर किसी गुण संपन्न व्यक्ति को अपना पति चुन लेती है। तब उस विधवा को पुनर्भू कहा जा सकता है।
श्लोक-32. यतेस्तु स्वेच्छया पुनरपि निष्क्रमणं निर्गुणोऽयमिति तदान्यं काडक्षेदिति बाभवीयाः।।32।।
अर्थ- बाभ्रवीयों के मतानुसार- कुछ स्त्रियां ऐसी भी होती हैं जो अपने पति से असंतुष्ट होने पर दूसरा पति चुन लेती हैं।
श्लोक-33. सौख्यार्थिनी सा किलान्यं पुनर्विन्देत।।33।।
अर्थ- बहुत-सी स्त्रियां सेक्स की इच्छा की पूर्ति के लिए दूसरी पुरुषों को प्राप्त करती हैं।
श्लोक-34. गुणेषु सोपभोगेषु सुखसाकल्यं तस्मात्ततो विशेष इति गोनर्दीयः।।34।।
अर्थ-
आचार्य गोर्दनीय का मानना है कि यदि स्त्री द्वारा छोड़े गये दूसरे, तीसरे
पुरुष से अधिक सेक्स कला में कुशल चौथा युवक हो तो वह पुनर्भू स्त्री
वर्तमान पति को छोड़कर चौथे युवक के पास जा सकती है। यदि चौथे युवक से भी
कोई दूसरा पुरुष अधिक गुणी हो तो उसके पास जाकर रह सकती है। इस प्रकार एक
के बाद एक निर्गुणी युवकों को छोड़ती हुई तथा गुणी युवकों के पास जाने वाली
पुनर्भू स्त्री की गणना वेश्याओं में होने लगती है।
श्लोक-35. आत्मनश्चित्तानुकुल्यादिति वात्स्याय़नः ।।35।।
अर्थ- आचार्य वात्स्यायन का कहना है कि पुनर्भू स्त्रियों को जो उचित लगे, उसे वही करना चाहिए।
श्लोक-36. सा बान्धवैर्नायकादापानकोद्यानश्रद्धादानमित्रपूजनादि व्ययसहिष्णु कर्म लिप्सेत।।36।
अर्थ- उत्तम कोटि की पुनर्भू स्त्री अपने परिवार वालों से, जिससे बनती हो, उससे उतना ही ले जिससे उसके शराब, मनोरंजन, दान-दक्षिणा तथा दोस्तों के आदर-सत्कार आदि का खर्च पूरा हो जाए।
श्लोक-37. आत्मनः सारेण बालंकारं तदीयमात्मीयं वा बिभृयात्।।37।।
अर्थ-
निम्नकोटि तथा मध्यम वर्ग की पुनर्भू स्त्री उपर्युक्त खर्च अपने स्वयं के
धन से करे और अपने ही आभूषणों को धारण करे। यदि स्वयं के गहने न हो तो
पुरुष के दिये हुए गहनों को पहने।
श्लोक-38. प्रीतिदायेष्वलनियमः।।38।।
अर्थ- नायक द्वारा प्रेम से दी गयी वस्तु के उपयोग का कोई विशेष नियम नहीं होता है।
श्लोक-39. स्वेच्छया च गृहान्निगच्छन्ती प्रीतिदायादन्यन्नायकदत्तं जीयते। निष्कास्यमाना तु न किंचिद्दद्यात्।।39।।
अर्थ-
यदि पुनर्भू स्त्री अपनी मर्जी से एक नायक को छोड़कर दूसरे के पास चली जाए
तो पहले नायक के दिये हुए उपहारों के अलावा शेष सभी चीजें उसे वापस कर
दें।
श्लोक-40. सा प्रभविष्णु तस्य भवनामप्नुयात्।।40।।
अर्थ- स्त्री जिस पुरुष के घर जाए वहां उसके घर की मालकिन बनकर रहे।
श्लोक-41. कुलजासु तु प्रीत्या वर्तेत।।41।।
अर्थ- उसकी अन्य पत्नियों से प्रेम का व्यवहार करें।
श्लोक-42. दहिण्येन परिजने सर्वत्र सपरिहासा मित्रेषु प्रतिपत्तिः। कलासु कलासु कौशलमधिकस्य च ज्ञानम्।।42।।
अर्थ-
पुरुष के घरवालों के साथ अनुकूलता का व्यवहार करें। उसके दोस्तों से हंसी
मजाक के साथ बात करें। कलाओं में कुशलता तथा अभिज्ञान का परिचय दें।
श्लोक-43. कलहस्थानेषु च नायकं स्वयमुपालभेत।।43।।
अर्थ- कुलटा स्त्रियों के साथ में रहने, कई रात बाहर रहने, उपाचित की हानि करने पर नायक को उलाहना दें।
श्लोक-44.
रहसि च कलया चतुःषष्टयानवर्तेत। सपत्नीनां च स्वयमुपकुर्यात्।
तासामपत्येष्वाभरणदानम्। तेषु स्वामीवदुपचारः। मण्डनकानि वेपानादरेण
कुर्वीतः परिजने मित्रवर्गे चाधिकं विश्राणनम्।
सामाजापानको-द्यानयात्राविहारशीलता चेति पुनर्भूवृत्तम् ।।44।।
अर्थ- पुरुष की इच्छा के अनुसार एकांत में सेक्स की 64 कलाओं का प्रदर्शन करें।
अपनी
सौतनों को शुभचिंतन बिना किसी प्रेरणा से करें। उनके बच्चों को कपड़े और
खिलौने आदि प्रदान करें। आवश्यकता के समय उन बच्चों के साथ अभिभाविका के
समान व्यवहार करें। बड़े सम्मान के साथ सौतन के बच्चों को वस्त्र आभूषण आदि
से सजाएं। पति के परिवार तथा दोस्तों के प्रति ज्यादा उदारता दिखाएं। शराब
का सेवन तथा सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक रुचि दिखाएं। पुनर्भू स्त्री के
ये चरित्र समाप्त होते हैं।
श्लोक-45.
दुर्भगा तु सापत्कपीड़िता या तासामधिकमिव पत्यावुपचरेत्तामाश्रायेत्।
प्रकाम्यानि च कलाविज्ञानानि दर्शयेत्। दौर्भाग्यद्रहस्यानामभावः।।45।।
अर्थ-
ऐसी पुनर्भू स्त्रियों में अभागिन पुनर्भू वे होती हैं जोकि अपने सौतनों
द्वारा सताई जाती हैं। ऐसी अभागिनों को चाहिए कि उस सौतन का पक्ष ग्रहण
करें। जिसे उनका नायक अधिक मानता हो। प्रदर्शन लायक कलाओं को उसे दिखाएं
क्योंकि कुशलता का परिचय करा देने से भी बदनसीबी समाप्त हो जाती है।
श्लोक-46. नायकापत्यानां धात्रेयिकानि कुर्यात।।46।।
अर्थ- पति की संतानों का पालन-पोषण धाय के समान करें।
श्लोक-47. तन्मित्राणि चोपगृह्य तैर्भक्तिमात्मनः प्रकाशयेत्।।47।।
अर्थ- पति के दोस्तों को अनुकूल बनाकर उनके द्वारा पति पर अपनी निष्ठा करें।
श्लोक-48. धर्मकृत्येषु च पुकश्चारिणी स्याद्धतोपवासयोश्च।।48।।
अर्थ- पति के घर धर्म-कार्य, व्रत तथा उपवास संबंधी जो त्यौहार पड़े उनमें वह आगे रहे।
श्लोक-49. परिजने दाक्षिण्यम्। न चाधिकमात्मानं पश्येत्।।49।।
अर्थ- पति के परिवार वालों के प्रति अनुकूलता जाहिर करती हुई वह अपना बड़प्पन न देखें।
श्लोक-50. शयने तत्सात्म्येनात्मनोऽनुरागप्रत्यानयनम्।।50।।
अर्थ- पति के साथ सोने के समय उसकी प्रकृति के अनुकूल अनुराग को पुनः उत्पन्न करें।
श्लोक-51. न चोपालभेत वामतां च न दर्शयेत्।।51।।
अर्थ- न तो पति को उलाहना दे और न ही अपनी चतुरा्ई दिखाएं।
श्लोक-52. यया त कलहितः स्यात्कामं तामावर्तेयेत्।।52।
अर्थ- यदि पति किसी पत्नी से लड़ाई-झगड़ा करके गया हो तो उसे अपनी तरफ से उसे मनाने की कोशिश करनी चाहिए।
श्लोक-53. यां च प्रच्छन्नां कामयेत्तामनेन सह संगमयेद्रोपयेश्च।।53।।
अर्थ- यदि पति किसी स्त्री से छिपकर प्रेम करता हो, तो उस स्त्री को अपने पति से मिलाने और फिर छिपा देने की कोशिश पुनर्भू स्त्री करे।
श्लोक-54. यथा च परिव्रतात्वमशाठयं नायको मन्येत तथा प्रतिविदध्यादिति दुर्भगावृत्तम्।।54।।
अर्थ- पुनर्भू स्त्री को ऐसा बर्ताव करना चाहिए जिससे नायक उसे पतिव्रता समझे। दुर्भगा का अध्याय यही समाप्त होता है।
अन्तःपुरिक वृत्त प्रकरण
श्लोक-55. अन्तःपुराणां च वृत्तमेतेष्वेव प्रकरणेषु लक्ष्येत्।।55।।
अर्थ-
उपरोक्त श्लोकों में बड़ी और छोटी सौतनों के जो आचरण बताये गये हैं। उसी
के अनुसार रनिवास की रानियों के आचरण की भी जानकारी रखनी चाहिए।
श्लोक-56. माल्यानुलेपनवासांसि चासां कञ्जुकीया महत्तरिका वा राज्ञो निवेदयेयुर्देवीभिः प्रहितमिति।।56।।
अर्थ-
रनिवास की दासियों तथा नौकरानियों को चाहिए कि वे रानियों की माला, लेप
करने का सामान तथा कपड़े लेकर राजा को यह कहकर दें कि इन्हें इस रानी ने
भेजा है।
श्लोक-57. तदादाय राजा निर्माल्यमासां प्रतिप्राभृतकं दद्यात्।।57।।
अर्थ- रनिवास की दासियों तथा नौकरानियों के द्वारा लायी हुई वस्तुओं को उन रानियों के पास भेजे, जिन्होंने माला और लेप आदि भेजी थी।
श्लोक-58. अलंकृत स्वलंकृतानि चापराह्वे सर्वाण्यन्तःपुराण्यैकध्येन पश्येत्।।58।।
अर्थ- राजा को चाहिए कि वह तीसरे पहर अंतःपुर (रनिवास) जाने की पोशाक पहनकर श्रृंगार की हुई रानियों के पास अचानक से पहुंचे।
श्लोक-59. तासां यथाकालं यथार्ह च स्थानमानानुवृत्तिः सपरिहासाश्च कथाःकुर्यात्।।59।।
अर्थ- रानियों
की शारीरिक क्षमता तथा उचित समय देखकर सेक्स करें। सेक्स के दौरान
एक-दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखें तथा हंस-हंसकर एक-दूसरे से बातें करें।
श्लोक-60. तदनन्तर पुनर्भ्रवस्तथैव पश्येत्।।60।।
अर्थ- इसके बाद रखैल स्त्रियों से भी इसी प्रकार का व्यवहार करें।
श्लोक-61. ततो वेश्या आभ्यन्तरिका नाटकीयाश्च।।61।।
अर्थ- इसके बाद रनिवास में रहने वाली वेश्याओं तथा रंगमंच की अभिनेत्रियों से भी ऐसी ही मुलाकात करें।
श्लोक-62. तासां यथोक्तकक्षाणि स्थानानि।।62।।
अर्थ- रानियों
का निवास स्थान रनिवास के बीच में हो, इसके बाद बाहरी कमरों में रखैल
स्त्रियों का, उसके बाहर वेश्याओं का तथा उसके बाद के कमरे में
अभिनेत्रियों और नाचने वाली नर्तकियों का निवास स्थान होना चाहिए।
श्लोक-63.
वासकपाल्यवस्तु तस्या वासको यस्याश्चीतो यश्याश्च ऋतुस्तत्परिचारिकानुगता
दिवा शय्योत्थितस्य राश्रम्ताभ्या प्रहितमंगुलीयकांकमनुलेपनमृतुं वासकं च
निवेदयेत्।।63।।
अर्थ-
रनिवास में राजा के भोग-विलास की व्यवस्था करने वाली दासियों को चाहिए कि
जिस रानी की सेक्स करने की बारी हो, किसी कारण से जिसकी बारी समाप्त हो गयी
हो तथा जिस रानी को मासिकधर्म आ
रहा हो, उन सभी की परिचारिकाओं को साथ लेकर भोजन समाप्ति के बाद उठे राजा
को उन रानियों के द्वारा भेजी गयी अपने नाम की अंगूठी, कुंकुम आदि का लेप
तथा वासक प्रदान करें।
श्लोक-64. तत्र राजा यद् गृह्वीयात्तस्या वासकमाज्ञापयेत्।।64।।
अर्थ-
उपहार में मिली वस्तुओं में से जिसकी अंगूठी राजा स्वीकार कर ले। उस रानी
की सेविका रानी को सूचित करे कि आज राजा रात में यहीं सोने आएंगे।
श्लोक-65. उत्सवेपु च सर्वासामनुरूपेण पूजापानकं च। संगीत-दर्शनेपु च।।65।।
अर्थ-
रनिवास में होने वाले सभी कार्यक्रमों एवं जश्नों में सभी रानियों का
सम्मान राजा शराब आदि के द्वारा करे। नृत्य एवं संगीत में भी स्त्री को
बराबर सम्मान देना चाहिए।
श्लोक-66.
अन्तःपुरचारिणीनां बहिरनिष्क्रमो बाह्यानां चाप्रवेश। अन्यत्र
विदितशौचाभ्यः अपरिक्लिष्टश्च कर्मयोग इत्यान्तः पुरिकम्।।66।।
अर्थ-
रनिवास में रहने वाली नारियों को बाहर नहीं निकलने देना चाहिए। इसके अलावा
संदिग्ध चरित्र वाली स्त्रियों को रनिवास में प्रवेश नहीं करने देना
चाहिए। जिन स्त्रियों का आचरण पवित्र हो केवल उन्हें ही रनिवास में प्रवेश
करने देना चाहिए। राजा को विभिन्न उच्चकोटि के आसनों के द्वारा रानियों के
साथ संभोग करना चाहिए। इस सूत्र के बाद रनिवास के आचरण समाप्त होते हैं।
श्लोक-67. भविन्ति चात्र श्लोकाः-
पुरुषस्तु बहून् दारान् समाहृत्य समो भवेत्। न चावज्ञां चरेदासु व्यलीकान्न सहेत च।।67।।
अर्थ- इस विषय से संबंधित प्राचीन श्लोक हैं।
इस सूत्र
के अनुसार जिस व्यक्ति की कई पत्नियां हो, उस व्यक्ति को सभी पत्नियों के
साथ एक समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा व्यक्ति न तो किसी पत्नी का अनादर करे
और न ही किसी के गलत कार्यों को बर्दाश्त करे।
श्लोक-68. एकस्यां या रतिकीडा वैकृतं वा शरीरजम्। विस्त्रम्भाद्वाप्यु-पालम्भस्तमन्यासु न कीर्तयेत्।।68।।
अर्थ-
यदि किसी रानी को सेक्स करने अथवा शरीर में उत्पन्न रोग अथवा कारणों से
कोई शारीरिक विकार हो तो ऐसी रानी को अपनी समस्याएं अन्य रानियों अथवा रखैल
स्त्री से न बताएं।
श्लोक-69. न तो दद्यात्प्रसरं स्त्रीणां सपत्न्नयाः कारणे क्वचित। तथोपालभमानां च दोषैस्तामेव योजयेत्।
अर्थ- राजा
को चाहिए कि वह अपनी पत्नियों के बीच आपस में लड़ाई करने का मौका ही न दे,
और जो पत्नी आकर दूसरी पत्नी की शिकायत करे, राजा को उसकी सुनकर उसी को
समझाना चाहिए।
श्लोक-70. अन्यां रहसि विस्त्रम्भैरन्यां प्रत्यक्षपूजनैः। बहुमानैस्तथा चान्यामित्येवं रञ्जयेत् स्त्रियः।।70।।
अर्थ-
राजा को किसी पत्नी को अकेले में यकीन दिलाकर, किसी पत्नी का प्रकट रूप
में सम्मान करके और किसी पत्नी को अधिक आदर करके अपने ऊपर सभी नारियों को
अनुरक्त रखने की कोशिश करते रहना चाहिए।
श्लोक-71. उद्यानगमनैर्भोर्दानैस्तज्झातिपूजनैः रहस्यैः प्रीतियोगैश्चेत्येकामनुरञ्जुयेत्।।
अर्थ- राजा को चाहिए कि सभी पत्नी को वह अलग-अलग घुमाये, भोग-विलास करे। उपहार प्रदान करें। उसके भाई-भतीजों का आदर सत्कार करे।
श्लोक-72. युवतिश्च जितक्रोधा यथाशास्त्रप्रवर्तिनी। करोति वश्यं भर्तारं सपत्नीश्चाधितिष्ठति।।72।।
अर्थ-
जो स्त्री अपने गुस्से को नियंत्रित करके कामशास्त्र के मुताबिक पति के
साथ आचरण करती है। वह स्त्री पति को अपने वश में करके, सभी सौतनों की तुलना
में पति की अधिक प्रिय बन जाती है।
पिछले
अध्याय में एकचारिणी पत्नी के आचार और व्यवहार के बारे में बताया गया है।
इस अध्याय में यह बताया गया है कि यदि वही एकचारिणी स्त्री यदि सौतनों के
बीच में पड़ जाती है तो तब उसमें जिज्ञासा उत्पन्न होती है कि उसे अपने
सौतनों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए। आचार्य वात्स्यायन के
अनुसार स्त्री के दुष्चरित्र होने से, स्त्री के बांझ होने से, पति की बेवकूफी से तथा हर बार लड़की होने से एकचारिणी पत्नी को सौतनों के ताने सहन करने पड़ते हैं।
आचार्य
वात्स्यायन ने सौतनों का वर्णन करते हुए बताया है कि मध्यम श्रेणी का
व्यक्ति उपरोक्त कारणों से दुबारा शादी करता है, लेकिन उच्च श्रेणी के लोग
शौकिया तौर पर कई विवाह करते हैं।
आचार्य
वात्स्यायन ने दो पत्नियों के रहते हुए बड़ी बहू के कर्तव्य का निर्देश
करते हुए बताया गया है। उसका सारांश यही है कि बड़ी बहू को छोटी बहू के साथ
बहन के समान बर्ताव करना चाहिए। उसकी गलतियों और उसके गुस्सा करने पर उसे
प्यार से समझाएं। उसकी सभी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखें। यहां तक कि उसे
सेक्स संबंधी उचित सलाह दें। उसके बच्चों को अपने बच्चों से अधिक प्रेम
करें। उसके मायके के लोगों को अधिक सम्मान दें।
यदि कई
सौतने होती हैं तो उनमें परस्पर ईर्ष्या-द्वेष और षड़यंत्र होते रहते हैं।
यदि पति किसी को अधिक प्रेम करता है तो दूसरी सौतन पत्नी उस पत्नी को हर
प्रकार से पति के नजरों में गिराने की कोशिश करती है।
आचार्य
वात्स्यायन के अनुसार यदि किसी कारणवश बड़ी सौतन बांझ हो तो छोटी सौतन को
उस पर किसी भी प्रकार का कमेंट नहीं करना चाहिए तथा पति को भी उससे विशेष
रूप से प्यार करने की सलाह देनी चाहिए। वात्स्यायन ने इस अध्याय के अंतर्गत
एक पुनर्भू प्रकरण भी रखा है। इसके अनुसार जिस स्त्री का पति मर जाता है।
यदि वह अपनी वासनाओं की तृप्ति के लिए किसी और को पति बना लेती है तथा फिर
उसे भी छोड़ना चाहती हो तो अपनी मर्जी से छोड़ सकती हैं। वात्स्यायन के
मतानुसार जिसने वासनाओं की पूर्ति के लिए पति का घर छोड़ दिया हो। वह एक
नहीं हजारों पतियों को छोड़ सकती है। लेकिन यदि वह लगातार इसी प्रकार पति
को छोड़ती जाएगी तो उसकी गणना वेश्याओं में होगी।
इति
श्रीवात्स्यायनीये कामसूत्रे चतुर्थेऽधिकरणे सपत्नीषु ज्येष्ठवृत्तं
कनिष्ठावृत्तं पुनर्भूवृत्तं दुर्भगावृत्तमान्तःपुरिकं पुरुषस्य बह्वीषु
प्रतिपत्ति- र्द्वितीयोऽध्यायः।।
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